10 मई 2013

गीत






क्या ये तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान है?


१.     अश्रु का संसार ना साझा किया

 सुख के मोती से मेरा दामन भरा।
               
               दु:ख के वीराने में यूँ भटके रहे
            
               क्या हांथ ना मेरा थामना स्वाभिमान है?

दिल ये मेरा सोच कर वीरान है, क्या ये तुम्हारे...........................


२.     देने का आग्रह ही बारम्बार था
 
 लेने से हरदम ही तुम्हें इन्कार था।

         देके दाता बन गये, सुख पा लिया

         पर क्या लेना याचना का भान है?

नयन मेरे देख कर हैरान हैं, क्या ये तुम्हारे.........................


३.     दो लोक के बदले में लेके दो मुट्ठी भात को

  कृष्ण ने भी तो सुदामा का बढ़ाया मान था।

         उस इक दिवस की आस में बैठे हुए

        जब इस हृदय के प्रेम की खातिर तेरा मस्तक नवेगा॥

नयन जल-धारा बहे अविराम है, क्या ये तुम्हारे.........................


                    X     X     X     X

4 टिप्‍पणियां:

  1. देके दाता बन गये, सुख पा लिया ... सच

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अक्षय तृतीया मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. सच में क्या केवल देना और कुछ भी स्वीकार न करना स्वार्थ नहीं है ? सामने वाले के प्रेम का अपमान नहीं है ?

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