12 अगस्त 2013

तलाश...!






तलाश
खुद की
खुद के भीतर
अनन्त कहीं गहराई में
पर
हर बार
कुछ दूरी तय कर
ठिठक जाती...
रोक लेती
तुम्हारी याद
मील के पत्थर की तरह...
यह सही भी है
क्योंकि नहीं तय होतीं
लम्बी दूरियाँ
बिना किसी सहारे के...
पर व्यर्थ ही होगी
ये तलाश
क्योंकि
मैं तो हूँ ही नहीं खुद में
तुम ही तुम हो
हर सिम्त
मुस्कुराते
तो खुद को कहाँ खोजूँ मैं
क्या तुम में ?
हाँ शायद,
तुममे ही
पूरी होगी मेरी तलाश.....!!

  x   x   x   x


14 टिप्‍पणियां:

  1. क्योंकि नहीं तय होतीं
    लम्बी दूरियाँ
    बिना किसी सहारे के...
    ***
    होता है रास्ते का सहारा, आशाओं का सहारा, या फिर किसी अपने से "तुम" का!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल मंगलवार (13-08-2013) को "टोपी रे टोपी तेरा रंग कैसा ..." (चर्चा मंच-अंकः1236) पर भी होगा!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. आपकी यह रचना कल मंगलवार (12-08-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  5. मैं तो हूँ ही नहीं खुद में
    तुम ही तुम हो
    हर सिम्त...
    ........कितना खूबसूरत एहसास...इसके बाद तो तलाश की ज़रुरत भी नहीं रह जाती ..है न

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  6. मैं तो हु ही नहीं खुद में कहीं ....
    बहुत बढ़िया ..

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  7. कोई जब पूर्णता में समा जाता है तो खुद की तलाश वहां जा कर पूरी होती है ...

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  8. जो मैं हूँ वही तुम हो जो तुम हो वही मैं हूँ , फिर भी ना तुम मैं हो ना मैं तुम हूँ .. :)

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  9. मैं तो हूँ ही नहीं खुद में
    तुम ही तुम हो
    हर सिम्त
    मुस्कुराते
    तो खुद को कहाँ खोजूँ मैं
    क्या तुम में ?
    हाँ शायद,
    तुममे ही

    बहुत सुंदर ।

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  10. मैं तो हूँ ही नहीं खुद में
    तुम ही तुम हो
    हर सिम्त...
    ........ खूबसूरत एहसास

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