25 फ़रवरी 2016

‘रूमी’ की कविताएँ (१)









कविताएँ : रूमी
अनुवाद : डॉ. गायत्री गुप्ता ‘गुंजन’


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कोई ये ना सोचे कि हम बुरी तरह टूट चुके हैं;

कि हममें दरारें पड़ चुकी हैं

हम तो केवल अपनी पत्तियाँ गिरा रहे हैं,

आने वाले वसन्त के लिए...



* * *



‘बुरा वक़्त’ सामने से आकर डराता है;

पर इसे गुज़र ही जाना है, क्योंकि

हर निराशा से कोई ‘आशा’ झाँकती है।

हर अँधेरे को कोई ‘सूरज’ ढूँढ़ता है।



* * *



आधी ज़िन्दगी तुमने दूसरों को लुभाने में गुज़ार दी;

आधी उनके द्वारा निर्मित भ्रम में गुज़र जाएगी;


छोड़ दो अब बहकना, यह खेल तुम बहुत खेल चुके...



* * *



‘क्रोध’ एक तूफ़ान की तरह है..

जो कुछ देर बाद शान्त हो ही जाता है..


परन्तु तब तक बहुत सी शाखाएँ टूट चुकी होती हैं।



* * *



दु:ख मत करो!

जो भी तुमने खोया है,

किसी और रूप में लौट आयेगा...



* * *



मेरे लिए दुनिया में एक सहज मुस्कान से अधिक कीमती कुछ भी नहीं;

ख़ासकर जब वो मुस्कान एक बच्चे की हो...

             



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