15 फ़रवरी 2016

‘तेरे-मेरे दरमियां’ .. (निज़ार कब्बानी)








‘तेरे-मेरे दरमियां’ : निज़ार कब्बानी
अनुवाद : डॉ. गायत्री गुप्ता ‘गुंजन’


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तेरे-मेरे दरमियां
साल दर साल पिघलते रहे
और होंठ थरथराते रहे, लरज़ते रहे
अपनी-अपनी जुम्बिशों के बीच..
किन्तु जब वे मिले
तो शताब्दियाँ ठहर गईं
और ज़िन्दगी काँच की तरह झरती रही
लम्हा-लम्हा...


* * *


तुम्हें पाया, तो कुछ पाने की ललक शेष ना रही
मेरी रूह ने तुम्हारे होने का पता दिया
तुमसे मिलने से पहले ही तुम्हारे प्यार में भीग चुका था मैं
तुम्हारे स्पर्श से पहले ही तुम्हारी धड़कनों का गुमां होने लगा था
तुम्हारे आगोश में आने से पहले ही तुम्हारी जुल्फ़ों में गुम हो चुका था मैं...


* * *


तुम्हारे-मेरे करने को अब बचा क्या है?
जब प्यार ने कलेजे को चीर ही दिया है, तो
धँस जाने दो इसे और गहरे...


* * *


तुम्हारी आँखों की कोर जादुई हैं
जो मुझे धीरे-धीरे कस रही हैं
मेरे सफ़हे मिटाती हुई
मेरी यादें गलाती हुई...


* * *


ये प्यार ही तो है
जिसमें हम खुद को सौंप देते हैं
जज़्ब हो जाने के लिए, फ़ना हो जाने की हद तक;
कैसा विरोधाभास है ना? कि..
विरह सुख देता है हमें और
मिलन की आँच तपाती है;
और हम हैं कि प्यार में ही जिये जाते हैं
रेज़ा-रेज़ा सुलगते हुये...


* * *


तुम तो वो हो, जिसके मधुर लहजे से
बारिशें शीतलता और मदहोशी उधार लेती हैं;
जिसके सजदे से उठने में
दिन के उगने सी कैफ़ियत बावस्ता हो, और
जिससे रौशन ये ज़िन्दगी का कारवां हो...


* * *


मैं जानता हूँ, जब मैंने पहली बार तुम्हारे समक्ष अपना प्यार उड़ेला था
तुम इसे छूना नहीं चाहती थीं, क्योंकि
तुम एक बार इसकी पीड़ा से गुजर चुकी थीं
पर मैं निराश नहीं था, क्योंकि मैं जानता था
कि तुम एक दिन मेरे लम्बे इन्तज़ार को भर दोगी
अपने अन्तहीन प्यार से...


* * *


जब ईश्वर ने ‘तुम्हें’ मुझे सौंपा
तो मुझे लगा कि मैंने वो सब पा लिया है, जो
उसकी अनगिनत पवित्र पुस्तकों में अनकहा रह गया था...


* * *


तुम कौन हो? ऐ स्त्री!
कटार की तरह मुझे अन्दर तक बींधती हुई
सौम्यता और सरलता की प्रतिमूर्ति
मोगरे की खुशबू से नहाई हुई..
तुम्हारी अल्हड़ता ही अनकही है, या
मैं शब्दहीन हो गया हूँ...?


* * *


तुम्हारे प्यार ने मुझे आश्चर्य के संसार में ला पटका है
इसने मुझे इस तरह अपने आगोश में जकड़ लिया है, कि
तुम्हारे अलावा सब भूलने लगा हूँ मैं
मेरे कानों में तुम्हारा ही नाम गूँजता है
चारों ओर तुम ही तुम नज़र आती हो मुझे
तुम्हारा प्यार एक जंगली पक्षी की तरह टूट पड़ा है मुझ पर
जिसे कुछ भी दिखाई और सुनाई नहीं देता
इसके पंख उलझ गये हैं मुझमें
इसकी चीखें मुझे कचोटती हैं...


* * *


ऐसा लगता है, जैसे मैं दिनों के इन्तज़ार में
दिनों को ही भूल गया हूँ;
बस,
तुम्हारे साथ ‘तुम’ होकर
गुज़र रहा हूँ मैं...


* * *


मेरी घड़ी तुम्हारा चेहरा दिखाती है
सबकी कलाइयाँ भी तुम्हारा ही पता देती हैं
सप्ताह, महीनों, वर्षों में भी
तुम ही गुज़र रही हो
मेरा वक्त कहीं नहीं गया
ये बस तुममें कहीं विलीन हो गया है...!!




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4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " बर्फ से शहर के लिए " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह आधयात्मिक वर्णन

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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