30 अगस्त 2012

सामाजिकता के मायने...!



बहुत समय पहले
पढ़ा था कहीं
कि मनुष्य होता है
एक सामाजिक प्राणी
अरस्तू ने कहा था शायद...
तब नहीं पता थे
सामाजिक होने के मायने
नहीं पता था कि
पहनना पड़ता है एक मुखौटा
और दबा देने होते हैं
एहसासात
दिल के भीतर ही कहीं...
नहीं कर पाता विरोध
ये दिल
उन घिसी-पिटी मान्यताओं का
जिन्हें रचा है समाज ने
एक आवश्यक प्रथा के रूप में
और सामाजिक होने की शर्त पर...
काश ! नहीं होते हम सामाजिक प्राणी
लेते हर निर्णय
दिल की ज़मीं पर
तब शायद इतने उठे होते हाँथ
कि कम पड़ जाते आंसू
और खिलखिलाती मुस्कान
हर चेहरे पर
जो छिप गयी है
मुखौटे के पीछे
हमारी सामाजिकता के.....!!

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7 टिप्‍पणियां:

  1. काश ! नहीं होते हम सामाजिक प्राणी
    लेते हर निर्णय
    दिल की ज़मीं पर
    तब शायद इतने उठे होते हाँथ
    कि कम पड़ जाते आंसू
    और खिलखिलाती मुस्कान
    हर चेहरे पर
    बेहद सशक्‍त भाव ...

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  2. सामाजिकता में बंधा इंसान .... बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  3. बेहद सुन्दर प्रस्तुति , वाकई सच कहा आपने

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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