12 सितंबर 2012

भरोसे के एहसासात...!



तुमने
दिल की ज़मीं पर
रोप तो दिया पौधा
प्यार का...
पर
दिया नहीं
खाद समय का...
सींचा नहीं
स्नेह के जल से...
समाधान नहीं खोजा
जगह-२ उग आये
प्रश्न रुपी
खरपतवार का...
फिर
कैसे तुम्हें
इत्मीनान है कि
उगेंगे
भरोसे के एहसासात
सुकून की डाली पर.....!!

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14 टिप्‍पणियां:

  1. इत्मीनान है कि
    उगेंगे
    भरोसे के एहसासात
    सुकून की डाली पर.....!!
    यकी़नन ...
    भावमय करते शब्‍द और रचना ।

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  2. प्रेम-प्रीत को बिरवा चले लगाय,
    सींचन की सुधि लीजो ,मुरझि न जाय!

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  3. खूबसूरत !

    कुछ पौंधे
    प्यार के
    उग जाते हैं
    बिना खाद
    हवा पानी के
    विश्वास की
    धरती पर !

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  4. भरोसा और संभाल दोनों ही जरूरी हैं ... प्रेम रुपी पौधे को फलने के लिए ...
    बहुत गहरे भाव सरलता से कह दिये ... लाजवाब ...

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  5. बहुत सुंदर । दोस्ती हो या प्यार स्नेह सिंचन की बडी जरूरत होती है । सिर्फ खरपतवार ही बिना देखभाल के पल जाती है ।

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  6. बहुत सुन्दर....
    भावपूर्ण रचना..

    अनु

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