31 मार्च 2014

निर्विकार, नि:शेष ज़िन्दगी...!






तुम रोज कहते
कल बिताओगे
अपना पूरा वक्त
मेरे साथ
और मैं
ज़िन्दगी से
अपने आज को
धीरे से बुहार देती...
अब तो
इस रोज-२ की बुहार
से
ज़िन्दगी इस कदर
निर्विकार हो गई है
कि
अब तो इसमें
मेरे दु:ख के स्याह टुकड़े
भी नहीं दीखते
और अश्रु भी
कहीं मलिन होकर
दुबक गए हैं.....!!

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-04-2014) को "स्वप्न का संसार बन कर क्या करूँ" (चर्चा मंच-1562)"बुरा लगता हो तो चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट का लिंक नहीं देंगे" (चर्चा मंच-1569) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    नवसम्वत्सर और चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
    परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना !

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