22 जुलाई 2013

अनुभूतियों के उजाले में...!






अनुभूतियों के उजाले में
एक परछाईं सी दिखती है
शायद एहसास है वो तेरा
महसूस तो यही होता है...

कभी-२ उलझन सी होती है
कि तुम होकर भी नहीं हो।
घर की दीवारों पर
तेरा लम्स सा महसूस होता है...

मैं हूँ, कि शायद वो भी नहीं हूँ
या मुझ में भी तू है,
यही तो वो जलजला है
जो मुझे जिन्दा रखता है.....!!

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2 जुलाई 2013

कवि की पीड़ा..!






अचानक एक दिन
लिखते-२
ठिठक गई मेरी कलम
दर्द..........!
किसका है ये दर्द ?
कहीं पूँछने ना लगें लोग...

क्या कवि सिर्फ़ अपनी ही पीड़ा लिखता है ?
क्यों नहीं समझते लोग
कि कवि के अन्दर
एक दूसरा समाज साँस लेता है
जिसके दर्द उसके होते हैं...
अभिव्यक्ति भले ही कवि की हो
परन्तु भोगा तो किसी और ने होता है।
कवि संवेदनशील होता है
जो एहसास कराता है, इस बाहरी समाज को
उस आंतरिक पीड़ा से
जिसकी ओर से इसने, आँखें बन्द कर रखी हैं
और पहन रखा है मुखौटा
प्रगतिशील होने का !!

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27 मई 2013

गज़ल






ख़ाक होने पे यकीं आया कि ज़मीं से बाबस्ता हैं हम।
वरना तो ख़ुदा होने में कोई कसर बाकी न रही॥१॥

अब तो यूँ कैद हैं खुद की बनाई कब्रों में।
जैसे इस दुनिया से अपनी कोई यारी न रही॥२॥

यूँ सरेआम जिस्म नोंचते हैं अबला का।
क्या उनकी अपने ख़ुदा से ही परदेदारी न रही॥३॥

हम तो जीते हैं यूँ, कि जानते हैं जिन्दा हैं।
वरना जीने की नीयत तुम जैसी, हमारी न रही॥४॥

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10 मई 2013

गीत






क्या ये तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान है?


१.     अश्रु का संसार ना साझा किया

 सुख के मोती से मेरा दामन भरा।
               
               दु:ख के वीराने में यूँ भटके रहे
            
               क्या हांथ ना मेरा थामना स्वाभिमान है?

दिल ये मेरा सोच कर वीरान है, क्या ये तुम्हारे...........................


२.     देने का आग्रह ही बारम्बार था
 
 लेने से हरदम ही तुम्हें इन्कार था।

         देके दाता बन गये, सुख पा लिया

         पर क्या लेना याचना का भान है?

नयन मेरे देख कर हैरान हैं, क्या ये तुम्हारे.........................


३.     दो लोक के बदले में लेके दो मुट्ठी भात को

  कृष्ण ने भी तो सुदामा का बढ़ाया मान था।

         उस इक दिवस की आस में बैठे हुए

        जब इस हृदय के प्रेम की खातिर तेरा मस्तक नवेगा॥

नयन जल-धारा बहे अविराम है, क्या ये तुम्हारे.........................


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19 मार्च 2013

सच का इंद्रधनुष...!






ज़िन्दगी के कुछ फ़लसफ़े

जो सही हैं

सबकी नज़र में

हम क्यों नहीं देख पाते उन्हें

एक नई नज़र से.....?


सिर्फ़ इसलिए

कि मिल गई है उन्हें सहमति

पूर्ण बहुमत की

जो शायद जरूरी है

सुदृढ़ता से खड़े रहने के लिए

इस समाज में...


या शायद 

हिम्मत नहीं है हममें

सच को सामने लाने की..

वो सच

जो ढक दिया गया है

झूठ के काले नकाबों से 

और चढ़ा दिया गया है सूली

वक्त की सलीब पर.....


वक्त की स्याही

झूठ के स्याह रंग को

और गाढ़ा कर देती है,

जिस पर सच का

कोई रंग नहीं खिल पाता.....


हिम्मत दिखानी होगी..

काली अँधियारी रात्रि को,

श्वेत प्रकाश से

धवल बनाने की.....


सच का दीप जलाना होगा

रंगों को जगमगाना होगा

कभी किसी को तो आगे आना होगा.....!!



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