25 मार्च 2014

सोहर / जच्चा (लोक-गीत)






सौंठ के लड्डू चरपरे हैं...

इक लड्डू मेरी सासुल ने माँगा..
बहू जरा दीजो, कस बने हैं..
आधा देत मोरी अँगुरी दु:खत हैं..
पूरो दियो ना जाए-
गरी के गोला नौ पड़े हैं..
पसेरिन इनमें घी भरो है..
छुआरे-मेवा सब पड़े हैं..
सौंठ के लड्डू चरपरे हैं.....॥१॥

इक लड्डू मेरी जिठनी ने माँगा..
छोटी जरा दीजो, कस बने हैं..
आधा देत मोरी अँगुरी दु:खत हैं..
पूरो दियो ना जाए-
गरी के गोला नौ पड़े हैं..
पसेरिन इनमें घी भरो है..
छुआरे-मेवा सब पड़े हैं..
सौंठ के लड्डू चरपरे हैं.....॥२॥

इक लड्डू मेरी ननदी ने माँगा..
भाभी जरा दीजो, कस बने हैं..
आधा देत मोरी अँगुरी दु:खत हैं..
पूरो दियो ना जाए-
गरी के गोला नौ पड़े हैं..
पसेरिन इनमें घी भरो है..
छुआरे-मेवा सब पड़े हैं..
सौंठ के लड्डू चरपरे हैं.....॥३॥

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10 मार्च 2014

गज़ल






हम तो हरदम मौत से, दो हांथ करके ही जिए।
ज़िन्दगी से अपनी यारी, तुमसे ज्यादा है तो है॥१॥

हम ना बैठेंगे सुकूँ से, जब तलक है जाँ में दम।
जलते रहना ही अगर, किस्मत हमारी है तो है॥२॥

ज़िन्दगी मायूस होकर, ना विदा कर तू मुझे।
बस फ़कत ये चार दिन की, तुझसे यारी है तो है॥३॥

दिल-ओ-जाँ कुर्बान थे, पहले ही औरों के लिए।
साँसों पर भी मौत की अब, पहरेदारी है तो है॥४॥

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5 मार्च 2014

तेरे ख्यालों में...!





वो जो कहते हैं कि
हमें उनमें कुछ नज़र नहीं आता
वो क्या जानें कि
हमारी नज़रों में,
वे सितारे से रवाँ होते हैं..

वो जिनके आने की आहट से ही
चटक जाती हैं, मदमस्त कलियाँ।
उनको शिकायत है कि
अनजाने ही हम,
गुल-ओ-बाग के पतझड़ की वजह होते हैं..

हमें उलझन है कि
वो क्यों, कुछ नहीं कहते
उनको फ़क है कि
हर इक अश़आर में उनके
हम ख्यालों से जवाँ होते हैं..

उस खुशी की वजह भले कुछ हो
खनकती है लबों पे जो हमारे-उनके
मगर ये अश्क तो
इक-दूजे की ही पनाहों में
बन के जज़बात बयाँ होते है.....!!

    
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15 फ़रवरी 2014

विवाह-गीत / बन्ना... (लोक-गीत)






बजा नगाड़ा प्रेम का, बन्ना ब्याहन आया !!

सड़कों आया री, गोरी का बन्ना सड़कों आया।
घोड़े पे हो सवार, बरात बन्ना ले कर आया॥१॥
बजा नगाड़ा..........

गलियों आया री, गोरी का बन्ना गलियों आया।
हाथ फ़ूलों के गाजरे, बन्ना ले कर आया॥२॥
बजा नगाड़ा..........

मण्डप आया री, गोरी का बन्ना मण्डप आया।
हाथ सिंदूर की डीबिया, बन्ना ले कर आया॥३॥
बजा नगाड़ा..........

सेजों आया री, गोरी का बन्ना सेजों आया।
हाथ इतर की डीबिया, बन्ना ले कर आया॥४॥
बजा नगाड़ा..........

घूँघट खोलो री, नादान बन्नी घूँघट खोलो।
मैं परदेशी पावना, जरा मुख से बोलो॥
कैसे बोलूँ री, नादान बन्ने कैसे बोलूँ।
सास-ननद की बहुरिया, कैसे घूँघट खोलूँ॥

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4 फ़रवरी 2014

गज़ल






हे वसन्त ! तू अपने जैसा मधुमय कर दे।
जितना रसमय है तू, मुझको भी रसमय कर दे॥१॥

प्रतिपल, प्रतिक्षण बहती है रसधार तुझमें।
मुझ पर भी तू प्यार की बौछार कर दे॥२॥

प्राणमय है, कान्तिमय है, वत्सल भी तू।
मैं हूँ अकेली, मुझको अपनी छाँव दे दे॥३॥

प्रीत की पुलकित सी कोमलता है तुझमें।
उस कोमलांगी छुअन का एहसास भर दे॥४॥

ईश्वर का अभिनव वरदान, जो तुझको मिला है।
उस अंश में मुझको भी भागीदार कर दे॥५॥

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