‘पथिक’ : स्टीफ़न क्रेन
अनुवाद : डॉ. गायत्री गुप्ता ‘गुंजन’
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पथिक..
ये देखकर आश्चर्यचकित था, कि
सत्य की ओर ले जाने वाले मार्ग पर
परत दर परत मातम ही पसरा था...
‘ओह!’, वह बोला;
‘सदियाँ हुईं यहाँ से कोई नहीं गुजरा’..
किन्तु जब उसने प्रत्येक परत में एक धारदार चाकू पाया
‘कोई बात नहीं’, अन्त में वह फ़ुसफ़ुसाया;
‘नि:सन्देह कुछ अन्य रास्ते अवश्य होंगे’...
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