15 जनवरी 2016

मैं फ़िर भी बढ़ूँगी.. (माया एंजेलो)





   मैं फ़िर भी बढ़ूँगी : माया एंजेलो
(अनुवाद : डॉ. गायत्री गुप्ता ‘गुंजन’)


भले तुम इतिहास बना दो मुझको
अपने कड़वे और सफ़ेदपोश झूठ से
जमीन पर गिराकर धूल होने तक
लेकिन फ़िर भी, धूल होकर भी
मैं आगे बढ़ूँगी..


क्या मेरी मुखरता सताती है तुम्हें?
या घिर आये अँधेरों से भी डर लगता है?
क्योंकि लहरा के मैं चलती हूँ कुछ इस तरह
जैसे मचलता हो समन्दर हसीन तेलों का

चाँद-सूरज की तरह, आस (विश्वास) की लहरों की तरह
ज्वार-भाटा की तरह, गिर-२ के भी, उठने के लिए
मैं आगे बढ़ूँगी..


आओ आगे बढ़ो, मुझे तोड़ने के लिए
सिर झुकाने के लिए, पलकें गिराने के लिए
मेरे कन्धों को झुकाओगे तुम आँसू देकर
भले खुश हो लो, मेरी दु:ख भरी चीखें लेकर

पर देखना उस वक्त तुम डर जाओगे
जब मेरे दर्प से चेहरा मेरा खिल जायेगा
सुन्न हो जायेंगे, इन कानों के पर्दे भी तब
जब हँसी गूँजेगी, सिक्कों की खनक से बढ़कर

बींध दो चाहे मुझे शब्दों से अन्तस तक
भले उतार दो कटार अपनी आँखों से
भले उड़ा दो मुझे नफ़रतों की आँधी में
लेकिन हवा होकर भी, खुद को सँभाले
मैं आगे बढ़ूँगी..


क्यों परेशान हो इस तरह मेरे यौवन से?
कि पलकें उठ के तेरी फ़िर से गिर नहीं पायें
मैं तो नाचूँगी अपने हाथों में उठा के गगन
कि जैसे हीरे जड़ा जिस्म लिए इठलाती पवन

शर्म-ओ-हया के खंडहर गिरा के
मैं आगे बढ़ूँगी..

जड़ों में बसे दर्द को झुठलाकर
मैं आगे बढ़ूँगी..


मैं एक लहराता, उछलता सुर्ख समन्दर हूँ
जिसके किनारों ने बन्धन तोड़ दिये हैं सारे
अब दु:ख और डरावनी रातों को भूलकर
मैं आगे बढ़ूँगी..

दिन के उस एक क्षण में
जब दूर-२ तक उजाला होगा
मैं आगे बढ़ूँगी..


चूँकि , मैं अपने पूर्वजों का भेजा हुआ उपहार हूँ
मैं गिरे हुए लोगों का स्वप्न और आशा हूँ

इसीलिए..

मैं बढ़ती हूँ..

आगे बढ़ती हूँ..

और बढ़ती ही जाती हूँ..!


       *****

26 मई 2015

नेमतों के गुलदस्ते...!




फ़िर से बख्शे हैं तूने नेमतों के गुलदस्ते
फ़िर से उट्ठे हैं मेरे हाथ दुआओं के लिए॥१॥

फ़िर से महके हैं किसी नज़्म के हँसी दस्ते
फ़िर से आया है कोई, बज़्म में अल्फ़ाज़ लिए॥२॥

फ़िर से दी है तूने आवाज मेरे सैदाई
फ़िर से आए हैं, फ़ना होने को जज़्बात लिए॥३॥

फ़िर चमक उट्ठा है आकाश किसी लौ की तरह
फ़िर से टूटा है इक तारा तेरी सौगात लिए॥४॥

फ़िर से आया है अँधेरा मुझे डराने को
फ़िर से चमके हैं ये जुगनू तेरी कोई बात लिए॥५॥

               ********


1 मई 2015

जीवन मुझको नया मिला...!




आज लिखा जीवन के पट पर
यारों मैंने गीत नया
नई सुगन्ध है, नई किरण है
जीवन मुझको नया मिला..

अब न रुकुँगी जीवन-पथ पर
प्रण मैंने है आज किया
जितने कंटक और शूल थे
आज सभी को पार किया..

आँखों में अब नहीं याचना
न ही अश्रु की है धारा
साँसों में है नई ताज़गी
शब्दों में जीवन-धारा..

साथ चलेगा जग मेरे अब
मैं सबको दिखलाउँगी
पथ-प्रशस्त कर इस जग का मैं
जग-जननी कहलाउँगी...


     ********

17 अप्रैल 2015

तेरे सदके...!




पाओगे कैसे हमें उनकी निगाहों में कहो
जबकि हम उनकी धड़कनों में बसा करते हैं..

हमने अपनी हर एक साँस वार दी उन पर
एक वो हैं, जो दो-चार धड़कनों का गुमां करते हैं..

ठहरो, बालिश्तों से क्या नापोगे तुम कद मेरा
हम वो ज़र्रा हैं, जो तूफ़ानों सा दम भरते हैं..

तुमने तो कह ली अपनी, और बस कहते ही गए
हम तो चुप रह के, उनके सजदे किया करते हैं..

तुम क्या सिखाओगे हुनर, दरिया में बहने का हमें
हम तो खामोश किनारों से सबक लिया करते हैं..


               ********

28 मार्च 2015

जनकपुर उत्सव है भारी




“ हो s s, रघुनन्दनजी घर आए,
              सजाओ बन्दनवार जी..
सब मिल के दीप जलाओ,
              गाओ मंगलचार जी...”

********

हो s जी... रघुनन्दन जी की भाँवर,
         पड़न लागीं, सियाजी के संग.....

हो जी, आवहु मैया-बाबुल
         करहु दान कन्या का..॥१॥

हो जी, कर के पीले हाथ
         सुफ़ल अपना जनम करो..॥२॥

हो जी, पाली, दुलारी, ये राजकुमारी
         विदा कर दो..॥३॥

हो जी, सुख से रहो तुम लाडली
         प्यार सभी का मिले..॥४॥


          ********

26 फ़रवरी 2015

सोहर / जच्चा (लोक-गीत)




हमरे तो पीर आवे, ननदी हँसत डोले-२

प्यारे सैंया, भोले सैंया
ननदी विदा करो
आज विदा करो, अभी विदा करो
हमरे तो पीर आवे...

साड़ी कढ़न गई, ब्लाउज सिलन गयो
गंगा-जमुना चढ़ रही हैं
कैसे विदा करूँ..
लेने कोई आया नहीं है
कैसे विदा करूँ..
हमरे तो...

साड़ी मैं अपनी दूँगी, ब्लाउज तो रानी का है
गंगा-जमुना नाव डला दो
ऐसे विदा करो..
छोटा देवर संग करूँगी
ऐसे विदा करो..
हमरे तो...


       ********

14 फ़रवरी 2015

प्रीत की झीनी चदरिया...!




आओ हम ताना बुने
ज़िन्दगी के करघे पर
एक हाथ तुम्हारा, एक मेरा
और रंग तो प्यार के ही होंगे ना?
और हाँ,
कुछ बूटे
नोक-झोंक,
मान-मुनहार के भी बनाना
तभी तो खिलेगी ना
हमारी, प्रीत की झीनी चदरिया...

देखो,
तुम रोते बहुत हो
ऐसा मत करना
वरना रंग बह जाएँगे
मुझे हल्के रंग पसन्द नहीं..
वैसे भी,
जो खुशी के आँसू हैं ना
वो रंगों को गीला रखने के लिए काफ़ी हैं..
एक बात और
पास ही रहना मेरे
जैसे एक जिस्म, दो जान
धागे जितने महीन और करीब हों
कपड़ा उतना ही सुन्दर होता है
और मुलायम भी...

सुनो,
डोर, जो विश्वास की है
तोड़ ना देना उसे
वरना कपड़े पे दिखती साँठ
चुभेगी ज़िन्दगी भर
जब भी सहलाना चाहोगे
प्यार से...

क्यों
बुनोगे ना?
एक ताना
प्यार का, विश्वास का
मेरे साथ
ज़िन्दगी के करघे पर.....!!

    ********